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सफर के आखरी शिखर पर अकेले ,मंजूर नहीं ..भाग-4

Byuser

Apr 10, 2021 ,

अभी तक आपने पढ़ा कि प्रोग्राम में शामिल सभी क्षात्र/क्षात्राएं डिसाइड करते  हैं कि  छोटे बच्चों के शोषण किये जाने के ऊपर एक नाटक तैयार किया जाए और इसे लिखने की जिम्मेदारी सभी क्षात्रो  को दे दी जाती  है अब आगे –

स्कूल से घर पहुचने के बाद हरी अपनी ड्रेस उतारकर उसके कमरे में लगी एक खूंटी पर टाँग देता है ,अपने  जूते और मौजे भी एक निश्चित जगह पर रख देता है ये उसका नित्य प्रतिदिन का कार्य है ,इसके बाद वह एक बाल्टी में पानी  लेकर घर के दरबाजे के पास बने ओपन बाथरूम में हाथ मूँह धोकर उसी खूंटी पर टंगे  कमीज और पाजामे को पहन कर  कमरे के एक कोने में रखे  स्टूल और कुर्सी की तरफ बढ़ जाता है, यहाँ बैठकर ही वह अपनी पढ़ाई करता है |

अन्य दिन की भांति हाथ मूँह धोने के बाद हरी अपनी माँ को- माँ भूख लगी है जल्दी से खाना दो की आबाज लगाता है लेकिन हरी ने आबाज नहीँ लगाई तो  उसकी माँ खुद उसके पास चली आईं और हरी के सर पर हाथ फेरते हुए बोलीं क्या बात है बेटा आज भूख नहीं लगी है  या कहीं कुछ खाकर आया है |हरी बोला नहीं माँ दरअसल आज बहुत ही आवश्यक काम करना है इसलिए आज खाने का भी समय नहीं है ,अब तो मैं सीधा शाम का ही खाना खाऊँगा |

हरी की माँ कहती रह गई कि बेटा सबसे जरूरी काम समय से खाना ,खाने का होता है लेकिन हरी ने अपनी  माँ को समझा बुझाकर भेज दिया और एक कॉपी पेन लेकर लिखने बैठ गया |हरी पेज पर लिखता उसे पढ़ता फिर काट देता ,घंटों ये सिलसिला चलता रहा अब अंधेरा होने लगा था लेकिन हरी अभी तक नाटक की आधी स्क्रिप्ट ही तैयार कर पाया था  |माँ बार बार हरी को खाना ,खाने को कह रही है अब वह माँ को और ज्यादा देर इंतजार नहीं करवाना चाहता था इसलिए उसने सोचा पहले खाना खा लूँ उसके बाद रात में लिख लूँगा |

ऐसा विचार कर वह सीधा रसोई में जाता है माँ उसी का इंतजार कर रही थी |गाँव में सभी अंधेरा होने तक खाना खा लेते हैं लेकिन आज तो खाने के लिए उसे कुछ ज्यादा ही  देर हो गई थी माँ ने थाली में हरी के लिए खाना परोसा और हरी को  देते हुए कहने लगी बेटा खाना हमेशा समय पर ही करना चाहिए ,हरी बोला ठीक है माँ आगे ध्यान रखूँगा  |हरी के खाना खा लेने के बाद ही हरी की माँ खाना खाती  थी, उसे अफसोस हो रहा था की मेरी वजह से माँ ने अभी तक खाना नहीं खाया |

हरी खाना खाने के बाद फिर से अपने कमरे में कॉपी पेन लेकर बैठ जाता है |माँ भी रसोई का काम खत्म करके सोने चली जाती है ,उसके पिताजी तो बहुत पहले ही  सो चुके हैं पर हरी की आँखों से नींद कोसों दूर है वह ठान लेता है  कि चाहे कितना भी समय हो जाये वह स्क्रिप्ट पूरी करके ही रहेगा |

हरी ने जब पेन और कॉपी बापिस अपने बैग में रखे  तो उसकी नजर सामने  राखी अलार्म घड़ी पर पड़ी तो सुबह के तीन  बज चुके थे लेकिन उसके चेहरे पर अब बिल्कुल भी तनाब या थकावट नहीं थी उसे संतोष था की उसने पहले ही दिन एक अच्छी स्क्रिप्ट तैयार कर ली है ,अगर मास्टरजी ने और बच्चों के द्वारा लिखी स्क्रिप्ट में से उसकी स्क्रिप्ट को पसंद किया तो ज्यादा से ज्यादा समय इस स्क्रिप्ट पर अभिनय की  प्रेक्टिस को मिल सकेगा |(आगे क्या होगा जानने के लिए कहानी का अगला भाग पढ़ना ना भूलें) |

 

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