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प्यार जताना ही तो नहीं आता

Byuser

Jul 7, 2021

यह मार्मिक कहानी एक ऐसे पिता की है जिसने  बड़ी सिद्दत के साथ अपने  बेटा बेटियों के लिए बो सब उपलब्ध कराने की कोशिश की जो उसकी क्षमता से बाहर था |  अपने तन- मन की बगैर फ़िक्र किये उनकी  ख़ुशीयों  की खातिर खुद  के अरमानों को कुचलने में जरा भी संकोच नहीं किया | उन्हें एक मजबूत आधार देने की कोशिश करता रहा ताकि जिस संघर्ष से उसे गुजरना पड़ा है उन्हें वह न झेलना पड़े | लेकिन जैसे ही उसकी उम्र का पहिया ढलान की ओर बढा ,उसके उन्हीं आँख के तारों ने आँखे तरेरनी शुरू कर दीं | 

कुछ ही समय पहले की बात है कि मुझे अपने एक निजी काम से लखनऊ जाना पड़ा | मुझे  स्टेशन से कुछ और किमी आगे जाने के लिए बस पकड़नी थी, सुबह का समय था तक़रीबन सुबह के सात बजे का समय रहा होगा मैंने बस स्टेण्ड इन्क्वारी से अपने गंतव्य पर जाने के लिए बस का समय मालूम किया तो पता चला वंहा जाने के लिए १० बजे से पहले की कोई बस नहीं है | दूसरा कोई साधन न होने के कारण मैं पास में ही एक छोटा गार्डन था वहां बेंच पर जाकर बैठ गया | इस समय उस गार्डन में  इक्का दुक्का बुजुर्ग ही चहल कदमी कर रहे थे | एक ब्यक्ति  मेरे सामने बाली बेंच पर बैठा था उसकी उम्र लगभग 55 से 60 वर्ष तक़रीबन रही होगी | चेहरे पर उदासी और परेशानी साफ नजर आ रही थी | मैंने एक बार उधर नजर डाली फिर अपने मोबाईल पर लग गया | अभी तक जो बुजुर्ग वंहा चहल कदमी कर रहे थे वे अपने घर लौटने लगे थे | लेकिन सामने बैठा व्यक्ति जस की  तस वंही बैठा था | मैंने मोबाईल पर नजर डाली जिसकी स्क्रीन पर अब 9 बजकर 30  मिनट हो रहे थे | इसलिए मैं भी बस पकड़ने के लिए  वहां से चल दिया | 

ठीक १० बजे मेरी बस गंतव्य की ओर बढ़ने लगी तक़रीबन 1 घंटेके सफर के बाद मैं अपने स्थान पर पंहुच चुका था | यंहा में जिस काम से आया था उसे निपटाते हुए मुझे दोपहर के एक बज गए और उसी समय मुझे लखनऊ की बापसी कि बस भी मिल गई जिसने मुझे बस स्टेण्ड पर 2 बजे लाकर उतार दिया अब मेरी ट्रेन रात  को 9 बजे की थी तो मैंने सोचा क्यों न सुबह बाले गार्डन में बेंच पर लेटकर थोड़ी कमर सीधी कर ली जाए | गार्डन में बेंच  इस तरह से लगाई गईं थी कि ज्यादा धुप होने पर पेड़ की छाया उन पर आती रहे इस समय  मेरे जैसे मुसाफिर ही वंहा घास पर पसरे पड़े थे कुछ बाकी बेंच पर बैठे थे मैंने चारों तरफ नजर घुमाई लेकिन कोई बेंच खली नहीं  थी | हाँ सुबह मेरे सामने बाली  बेंच पर जो ब्यक्ति बैठा था वो अब भी वहां बिराजमान था जिसे देखकर मैं अनायास ही उस तरफ चल दिया | मेरी उम्र भी उन शख्श से थोड़ी बहुत ही कम होगी फिर भी मैंने पूछा अंकलजी मैं यहाँ बैठ सकता हूँ उन्होंने मुझे इशारे से बैठ जाने को कहा | 

अभी बैठे हुए मुझे कुछ ही समय हुआ होगा कि  एक बच्चा जो १० या 11 वर्ष का रहा होगा उस व्यक्ति का हाथ  पकड़कर बोला -बाबा घर चलो ना सुबह से आपने खाना भी नहीं खाया है | एक अबोध बालक का आग्रह उस ब्यक्ति को अंदर से ऐसा भाबुक कर गया कि बच्चे की तरह फफक कर रो पड़ा और रोते हुए बोला  बेटा घर कैसे जाऊं तेरी मम्मी और पापा ने तो  कहा है अब अपनी सूरत मत दिखाना | मासुम की समझ में कुछ नहीं आ रहा था हाँ जो उसकी समझ में आया उसी के अनुसार उसने कहा बाबा जी जब मम्मी पापा मुझ पर गुस्सा करते है तो मैं उन्हें प्यार जताकर मना लेता हूँ आप भी मम्मी पापा पर प्यार जताकर उन्हें मना लेना | बच्चे की भोली बातों ने उसको और हिला दिया और उसके मुंह से निकला मेरे बच्चे मुझे प्यार जताना ही तो नहीं आता | 

अब तक मेरी समझ में सब कुछ आ चूका था एक  अजनबी होते हुए मैं उन्हें सांत्वना  देने से नही रोक पाया और  बड़ी मुश्किल से उन्हें चुप करा पाने में सफल हुआ थोड़े शांत होने पर  उन्होंने जो अपना दर्द  वयां किया उसे सुनकर  मेरी भी आँखों में आंसू छलक पड़े | उनके अनुसार कम उम्र में ही उनकी पत्नी एक बीमारी में उनका साथ छोड़कर दूसरे धाम चली गईं उनके दो बेटे एक बेटी थी उनका लालन  पोषण उन्होंने अपने हाथों किया बच्चों को कोई तकलीफ न हो इसलिए शादी नहीं की | रात  दिन मेहनत करके शहर में मकान बनाया | तीनों बच्चों  की अच्छी से अच्छी शादियां की | बच्चे बड़े हुए तो सारा कारोबार उनके हातों देकर  ये सोचा कि अब चैन की रोटी खाऊंगा | कुछ दिन तो ठीक ठाक चला  लेकिन उनके छोटे लड़के ने जिनके साथ वह रह रहे थे अपनी मर्जी चलानी शुरू की और बना बनाया काम  बिगाड़ने लगा , बस मैंने थोड़ी टोका- टाकी क्या की मुझसे कहा पिताजी तुम्हें कुछ पता तो है नहीं इसलिए चुप रहा करो लेकिन भाई जब अपना आशियाँ उजाड़ रहा हो तो कोई चुप कैसे रह सकता है  | आज मैंने कहा मैं भी तुम्हारे  साथ शॉप पर चलूँगा फिर क्या था मुझे बाहर का रास्ता दिखा दिया और कहा अपनी शक्ल मत दिखाना इसलिए मैं सुबह से यहाँ बैठा हूँ जाऊं तो जाऊं कहाँ | 

ये मासूम मेरा पोता है इसमें मेरे प्राण  हैं अब इसे कैसे समझाऊं कि आत्मसम्मान खोकर उस घर में बापिस कैसे जाऊं | मैंने पूछा अंकलजी क्या आपके दोनों  बच्चे एक जैसे है उन्होंने कहा जब सबसे अच्छा बेटा ही मुझे आँख दिखा रहा है तो दूसरा तो पहले से ही बड़ा अक्खड़  स्वाभाव का है वह तो मुझे कदापि नहीं रखेगा वैसे तो वह नजदीक कस्वे में रहता है   | मैंने उनसे कहा आप उसका फोन नंबर दो मैं  बात करता हूँ | उनको फोन नम्बर याद था मैंने जैसे ही नम्बर मिलाया उसने फोन उठाया और मैंने बिना रुके सारी बात उसे बता दी बात पूरी होते ही उसने फोन काट दिया | फोन कटते  ही वे बोले मैं तो पहले ही कह रहा था वह नहीं सुनेगा अब मुझे भी समस्या बड़ी   गंभीर नजर आ रही थी | इस बीच उन्होंने  अपने पोते को समझाकर  घर बापिस भेज  दिया था | कुछ ही समय बिता होगा कि गार्डन के आगे एक कर रुकी जिसमें से एक लड़का और उसकी पत्नी उतरे और सीधा गार्डन की तरफ  नजर घुमाने लगे और अंकल जी पर नजर पड़ते ही उधर ही आ गये | ये उनके बेटा और बहु थे  जो मेरा फोन सुनते ही वहां  से चल पड़े थे | बहु ने अपने ससुर के पैर छुए और कहा पिताजी हमें माफ़ कर दो आप इतने तकलीफ़ में थे और हमें पता ही नहीं था आप घर चलो  आपका आशिर्बाद रहेगा तो इनकी और ज्यादा तरक्की होगी | अब उनकी आँखों में आंसू  तो थे मगर चेहरे पर  संतोष भी था उन्होंने  मुझे बड़ी कृतज्ञा से देखा जैसे मैंने उन्हें कोई बहुत बड़ा सहारा  दिया हो  | मेरे मुहं से निकला जो  प्यार जताये जरुरी नहीं वो  प्यार करता हो वैसे ही जो गुस्सा  दिखाता हो जरुरी नहीं कि वह प्यार न करता हो | उनके जाते ही मैं भी स्टेशन की तरफ बढ़ चला था | काश हर बच्चा ये समझ जाए कि जो त्याग हमारे पेरेंट्स करते हैं जरुरत पड़ने पर उन्हें भी उनका ख्याल रखना एक जिम्मेवारी है ,बोझ नहीं | 

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