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ओ मेरे गधे अब तेरा ही सहारा ,तू ही पेट भरेगा हमारा

Byuser

Aug 27, 2021

एक गाँव में एक साधुओं की मण्डली ठहरी हुई थी | गाँव के लोग साधुओं का सम्मान करने वाले थे | साधुओं की खूब आवभगत हो रही थी किसी के यहां से कुछ आता कभी किसी के यहां से कुछ | इन सारी घटनाओं पर एक कुम्हार की नजर थी उसने सोचा मैं पुरे दिन गधे पर सामान ढोता हूँ तब कहीं जाकर दो बक्त की रूखी सुखी रोटी नसीब होती है और एक तरफ ये साधु हैं जो कुछ भी नहीं करते फिर भी इनको अच्छा खाने को मिल रहा है | उसने अपने घर बालों से कहा मैं तो साधुओं की टोली में जा रहा हूँ | वहां बहुत अच्छे- अच्छे पकवान आते हैं तुम भी वहीँ आ जाया करना मैं तुम्हें भी दे दिया करूँगा | कुम्हार अपने कपडे गेरुए रंग में रंगकर साधुओं की टोली में शामिल हो गया | कुम्हार को भी नित्य नए पकवान मिलने लगे जो भी बचता वह अपने घर से आये सदस्य को दे देता इसी तरह उसके कई दिन निकल गए | एक दिन गुरु साधु बोला एक ही गाँव में ज्यादा दिन ठहरना साधुओं के लिए ठीक नहीं है इसलिए अगले गाँव जाने की तैयारी करो | सभी साधुओं ने अपना अपना कमंडल उठाया और अगले गाँव की तरफ प्रस्थान कर दिया | कुम्हार भी अन्य साधुओं के साथ वहीँ पहुँच गया | उस गाँव के लोग बड़े कठोर किस्म के थे वे साधु संतों की बातों में यकींन नहीं करते थे | इसलिए उनके लिए वहां खाना भी कोई लेकर नहीं आया | साधुओं को तो कई कई दिन ब्रत करने की आदत थी कोई खाना लेकर आये या नहीं उन्हें तो लोगों को ईश्वर की साधना करने को प्रेरित करना था | इसके लिए उस गाँव में रुकना भी जरुरी था और वह अपना कार्य बड़े धैर्य के साथ कर रहे थे | इधर कुम्हार ने पहला दिन तो जैसे तैसे निकाल लिया लेकिन जब दूसरे दिन भी उसे कुछ खाने को नहीं मिला तो वह बिचलित होकर कहने लगा -ओ मेरे गधे अब तेरा ही सहारा तू ही पेट भरेगा हमारा | साधुओं ने उसकी इस हरकत से जान लिया कि यह कोई साधु नहीं बल्कि कुम्हार है | साधुओं के पूछने पर उसने सारी बात सच- सच बता दी | गुरु साधू ने उसकी बात सुनकर कहा जो चीज जितनी सुगम दिखाई देती है वह बैसी होती नहीं है | कुम्हार की समझ में बात आ गई और वह बापिस अपने घर लौटकर अपने पुराने काम, गधे पर ढुलाई पर लग गया |

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