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नवरातरे पहला दिन माँ शैलपुत्री की आराधना

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Apr 13, 2021
अनंत शक्तियों से संपन्न माँ शैलपुत्री  का स्वरूप
वन्दे वांच्छितलाभाय चंद्रार्धकृतशेखराम्‌ । वृषारूढ़ां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्‌ ॥
मां दुर्गा को सर्वप्रथम शैलपुत्री के रूप में पूजा जाता है। हिमालय के यहां पुत्री के रूप में जन्म लेने के कारण इनका नाम  शैलपुत्री रखा गया । इनका वाहन वृषभ है, इसलिए इन्हैं  देवी वृषारूढ़ा के नाम से भी जाना जाता  हैं। इनके  दाएं हाथ में त्रिशूल  और बाएं हाथ में कमल सुशोभित है। ये  देवी प्रथम दुर्गा हैं। ये ही सती के नाम से भी जानी जाती हैं। उनकी एक मार्मिक कहानी इस तरह से  है।
एक बार जब प्रजापति ने यज्ञ किया तो इसमें भगवान शंकर  को छोड़कर बाकी सभी देवताओं को निमंत्रित किया गया । नारदजी के बताने पर सती यज्ञ में जाने के लिए विकल हो उठीं। शंकरजी ने सती को समझाते हुए कहा कि सारे देवताओं को निमंत्रित किया गया है, उन्हें नहीं। ऐसे में वहां जाना उचित नहीं है।
सती का प्रबल आग्रह देखकर शंकरजी ने उन्हें यज्ञ में जाने की अनुमति दे दी। सती जब घर पहुंचीं तो सिर्फ मां ने ही उन्हें स्नेह दिया। बहनों की बातों में व्यंग्य और उपहास के भाव थे। भगवान शंकर के प्रति  तिरस्कार का भाव यज्ञ में उनका उचित आसन ना देखकर सती को भारी दुख हुआ इसके बाद उनके पिता  दक्ष ने भी भगवान शंकर को अपमानजनक वचन कहे। इससे सती को क्लेश पहुंचा।
वे अपने पति का यह अपमान न सह सकीं और योगाग्नि द्वारा अपने को जलाकर भस्म कर लिया। इस दारुण दुःख से व्यथित होकर शंकर भगवान ने उस यज्ञ का विध्वंस करा दिया। यही सती अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्मीं और शैलपुत्री कहलाईं।

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