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कहानी सफर के आखरी शिखर पर अकेले ,मंजूर नहीं-16

Byuser

May 27, 2021

अभी तक आपने पढ़ा हरी माधवी का पता लगाने उसके घर जाता है जहां उसकी मुलाकात उमा से होती है उमा हरी को बताती है कि माधवी की पोस्टिंग अपने ही जिले में है हरी घर बापिस आता है और  अपने पिताजी से मिलता है दोनों घंटों बात करते रहते हैं -अब इससे आगे –

दूसरे दिन हरी दैनिक कार्यों से फारिग होकर अपने दोस्त की बाइक लेकर जिले के पुलिस हेड क्वाटर रवाना हो जाता है इस दौरान वह माधवी को दिए जाने वाले गिफ्ट को लेना नहीं भूलता उसके घर से तकरीवन 30 मिनट बाइक द्वारा माधवी के ऑफिस पहुचने में समय लगेगा और इस आधे घंटे में हरी के दिमाग में माधवी ही छाई रही मेरे अचानक ऑफिस पहुचने पर कैसे रिएक्ट करेगी आदि-आदि |

ऑफिस के गेट पर पहुचने के बाद उसने बाइक एक तरफ खड़ी की और गेट के ऊपर खड़े संतरी को अपना आई कार्ड दिखाया संतरी ने उसे अंदर जाने दिया जाते हुए उसने माधवी के ऑफिस की डायरेक्शन भी मालूम कर ली और उसी तरफ बढ़ गया ऑफिस के सामने पहुँचने के बाद ऑफिस के अर्दली को उसने अपना परिचय दिया अर्दली अंदर गया और माधवी को सेलुट करते हुए आगंतुक के वारे में बताया माधवी ने अर्दली को कहा उन्हें अंदर भेज दो और ध्यान रहे जब तक मेरी उनके साथ मीटिंग चले कोई भी अंदर ना आए |अर्दली ने फिर सेलुट किया और बाहर आकर हरी को अंदर जाने का इशारा किया |

हरी की धड़कने तेज हो चली थीं लेकिन जैसे ही उसने अंदर कदम रखा और माधवी के चेहरे पर नजर पड़ी उसके कदम वहीं ठहर गए दरअसल उसकी नजर माधवी के माथे पर लगे सिंदूर और बिंदी पर पड़ चुकी थी उसे एक क्षण तो लगा कि वह चक्कर खाकर गिर पड़ेगा लेकिन उसने अपने आप को संभाल लिया तभी माधवी ने कहा हरी क्यों रुक गए अंदर आओ |

हरी माधवी के सामने पड़ी कुर्सियों में से एक कुर्सी पर बैठ गया उसके मुहँ से कोई बोल नहीं निकल पा रहे थे लेकिन माधवी स्थिर थी उसने हरी से पूछा कैसे हो हरी तुम्हारी ट्रेनिंग कब खत्म हुई और गाँव कब पहुंचे कई सवाल एक साथ पूछे जाने के बाद भी हरी कोई भी जवाब नहीं दे पा रहा था उसकी नजर तो बस माधवी के सिंदूर पर अटकी हुई थी |

हरी की बदहवास स्थति का अनुमान लगाते हुए माधवी अपनी कुर्सी से खड़ी हुई और हरी की कुर्सी के पास जाकर उसे झँझोड़ते हुए बोली हरी अपने आपको को संभालो मुझे तुमसे बहुत सारी बातें करनी है अब तक हरी कुछ संभल चुका था उसने प्रश्नबाचक नजरों से माधवी की तरफ देखा ,माधवी उसके मौन प्रश्नों को समझते हुए बोली सब बताती हूँ और उसने शुरू से लेकर शादी  होने तक शादी से पहले उसे फोन करने तक की सारी बातें डिटेल में बताईं |

माधवी हरी की मौन अवस्था देखकर फिर कहना शुरू कर देती है देखो हरी जो हमारी किस्मत में लिखा है वही हुआ है और फिर हमारा प्यार किसी बंधन का मोहताज नहीं है हमारी रूह एक दूसरे के साथ जुड़ी है और जुड़ी रहेगी लेकिन सामाजिक रिश्तों को निभाना भी हमारी उतनी ही जिम्मेवारी है | तुम्हें बो दिन याद है जब हम दोनों एक सुनसान जगह पर मिल रहे थे उस समय में बहकने लगी थी तब तुमने कहा था माधवी हम एक दूसरे से आत्मा से जुड़े हैँ ,शारीरिक संबंध उस पवित्र प्यार को कलंकित कर देंगे उस दिन के बाद मेरे मन में तुम्हारे लिए और इज्जत बढ़ गई थी |

हरी मौन उसकी बात सुने जा रहा था कुछ देर दोनों मौन रहे फिर माधवी ने ही बोलना शुरू किया देखो हरी तुम मुझसे प्यार करते हो इसमें कोई दोराय हो ही नहीं सकती वैसे ही में तुम्हैं प्यार करती हूँ लेकिन प्यार का ये मतलब बिल्कुल भी नहीं है कि  हम शारीरिक तौर पर मिलेंगे तभी हमारा प्यार पूर्ण होगा  |इसी प्यार का वास्ता देकर आज में तुमसे कुछ मांगना चाहती हूँ इस वार हरी ने मुंह ऊपर किया और माधवी की तरफ देखा जैसे पुछ रहा हो बोलो माधवी क्या मांगना चाहती हो जो भी माँगोगी हरी जरूर देगा |इससे आगे की कहानी अगले भाग में-

 

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