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लोक कथा -अभी तो और होनी बाकी है

Byuser

Jun 30, 2021

एक दिन की बात है कि एक पंडित जी कहीं जा रहे थे कि उनका पैर रास्ते में पड़ी एक खोपड़ी से टकरा गया | पैर की ठोकर लगते ही खोपड़ी खिलखिलाकर हंस पड़ी | पंडितजी ने खोपड़ी से कहा तेरी इतनी दुर्गति हो रही है फिर भी तुझे हंसी सूझ रही है | पंडितजी की बात सुनकर खोपड़ी ने कहा अभी तो और दुर्गति होनी बाकी है |खोपड़ी की बात सुनकर पंडितजी को उस पर दया आ गई और वे खोपड़ी से बोले अब और तेरी दुर्गति नहीं होने दूंगा ऐसा कहकर उन्होंने खोपड़ी को अपने दुप्पटे में लपेटकर घर ले आया |
घर आकर पंडितजी ने अपनी पत्नी से कहा कि इस दुप्पटे में तुम्हारे मतलब की कोई चीज नहीं है इसलिए इसे मत खोलना ऐसा कहकर पंडितजी ने वह दुपट्टा खोपड़ी सहित एक संदूक में बंद कर ताला लगा दिया | पंडतानी ने भी पंडितजी की बात मानकर उसे कभी खोल कर नहीं देखा |
एक दिन पंडतानी की एक सहेली उनके घर आई पंडतानी ने पंडितजी की ले हुई अनेकों चीजें अपनी सहेली को दिखाई लेकिन खोपड़ी बाले संदूक को उसने खोल कर नहीं दिखाया जब सहेली ने पूछा इसमें क्या है तब पंडतानी बोली तुम्हारे जीजाजी ने इसे खोलने को मन किया है और कहा है इसमें तुम्हारे मतलब की कोई चीज नहीं है ,ऐसा सुनकर सहेली की उत्सुकता और बढ़ गई | उसने संदूक खोलकर वह चीज देखने की जिद की तो पंडतानी ने दुपट्टा खोलकर देखा तो उसमें एक खोपड़ी रखी थी| सहेली ने कहा तुम तो कहती हो कि पंडितजी मुझसे कोई दुराब नहीं करते लेकिन उन्होंने तो तुम पर टोना टोटका किया हुआ है | सहेली की बात सुनकर पंडतानी को भी लगा कि उसकी सहेली ठीक कह रही है | पंडतानी ने टोटका से मुक्त होने के लिए उस खोपड़ी को बारीक़ कूट पीसकर नाली में बहा दिया | रात को पंडितजी लघुशंका को उठे तो नाली से उन्हें वही चिरपरिचित हॅसने की आबाज सुनाई दी | पंडितजी के पूछने पर खोपड़ी के चूर्ण से आबाज आई कि मैंने तुमसे कहा था कि अभी तो मेरी और दुर्दशा होनी शेष है | मेरे बुरे कर्म अभी बाकि है तब तक इसी तरह मेरी दुर्दशा रहेगी | जब पंडितजी ने अपनी पत्नी से पूछा तो उन्हें सारी बात पता चली | पंडितजी ने पंडतानी से कहा कोई दूसरे के किये गए बुरे कर्मों से उसको बचा नहीं सकता उसका दंड उसे स्वयं ही भुगतना पड़ेगा

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