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कटोरा पेच

Byuser

Aug 3, 2021

एक गांव में गुरूजी अपने शिष्यों को कुश्ती के दाव पेच सिखाया करते थे | गावं का सरपंच 10 रूपये शिष्य के हिसाब से गुरूजी को पैसे दिया करता ,इस तरह उनका गुजारा चल रहा था | गुरूजी के शिष्यों में एक शिष्य बड़ा होशियार था उसने गुरूजी से सारे दाव पेच सिख लिए | दाव पेच सिखने के बाद उसने सोचा कि अब तो में गुरूजी को भी पछाड़ सकता हूँ तो क्यों न मैं उन्हें हराकर कुश्ती का गुरु बन जाऊं , ऐसा सोचकर वह सरपंच के पास गया और बोला कि अब मैं गुरूजी को कुश्ती में हरा सकता हूँ इसलिए मुझे इस अखाड़े का गुरु बना दिया जाए | जो राशि आप गुरूजी को देते हैं वह मुझे मिलनी चाहिये |
सरपंच ने कहा ने कहा इस बात का फैसला तो अखाड़े में ही किया जा सकता है | तुम दोनों की कुश्ती कराई जायेगी जो भी कुश्ती जीतेगा उसी को इस अखाड़े का गुरु घोषित किया जायेगा और जो राशि दी जा रही है वह जो जीतेगा उसी को मिलेगी , ऐसा कहकर सरपंच ने गुरूजी को बुलाया और अपना फैसला सुनाया गुरुजी ने भी सहर्ष स्वीकृति दे दी और एक दिन निश्चित कर दिया गया |
नियत दिन गांव भर के लोग कुश्ती देखने अखाड़े के आस पास मैदान में इकठ्ठा हो गए सभी उत्सुकता थी कि गुरु जीतेगा या शिष्य | गुरूजी अभी तक नहीं पहुंचे थे लेकिन उनका शिष्य अपने लंगोट को पहने अखाड़े में नए नए करतब दिखा रहा था जिसे देखकर लोग कहते, लगता है गुरूजी अपने शिष्य से हार जाएंगे इसीलिए अभी तक आये भी नहीं है |
काफी देर तक भी जब गुरूजी नहीं आये तो उनको बुलाने के लिए हरकारा भेजा गया | गुरूजी दूध पीकर कटोरे को मल रहे थे | गुरूजी ने हरकारे से कहा कि मैं कटोरा पेच करके अभी आ रहा हूँ | हरकारे ने आकर वैसे ही कह दिया कि गुरूजी ने कहा है कि मैं कटोरा पेच करके अभी आता हूँ | हरकारे की बात सुनकर शिष्य सोच में पड गया कि यह कटोरा पेच कौन सी बला है | गुरूजी ने तो यह पेच मुझे सिखलाया ही नहीं | वह बिचार में पड गया | निश्चित समय पर कुश्ती शुरू हुई | शिष्य के मन में दुबिधा बनी थी कि ना जाने गुरूजी का कटोरा पेच किया है और कब उसका इस्तेमाल करेंगे | शिष्य की दुबिधा का लाभ उठाते हुए गुरूजी ने अबसर पाकर शिष्य को पछाड़ दिया | सब लोग बाह बाह कर उठे | और इसी बीच सरपंच ने खुश होकर घोषणा की गुरूजी को आजीवन मासिक गुजारा राशि दी जाया करेगी |

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