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कार्तिक स्नान -जैसी आस्था बैसा फल

Byuser

Aug 20, 2021

बहुत, समय पहले की बात है कि एक गांव में एक परिवार रहता था परिवार में कुल मिलाकर तीन जने थे | माँ बेटा और बहू | माँ की गंगा स्नान की इच्छा हुई तो उसने अपने बेटे से कहा बेटा साबन का महीना आ रहा है और मैं सावन से लेकर कार्तिक तक गंगा का स्नान करना चाहती हूँ सो तू मुझे गंगाजी पर छोड़ आ | बेटे ने माँ के लिए एक पीपा लड्डू बनवाकर गाड़ी में बिठाकर गंगाजी पर ले गया वहां उसने एक झोपडी बना दी और पड़ोसियों से कह दिया मेरी माँ बूढी है अत : प्रात : काल जब तुम गंगा स्नान जाओ तो मेरी माँ को भी साथ ले लेना |
बुढ़िया रोज सुबह उठकर अन्य स्त्रियों के साथ गंगा स्नान को जाती और खूब प्रेम से हरी का स्मरण करती | पुरे दिन वह सत्संग करती , हरी के भजन गाती और रात को एक लड्डू खाकर सो जाती | एक रात बुढ़िया लड्डू निकाल कर खाने लगी तो बाहर से आबाज आई बुढ़िया ने पूछा कौन है ? उत्तर मिला मैं सावन हूँ | बुढ़िया ने किवाड़ी खोली और सावन का स्वागत करते हुए बोली आओ सावन के महीने तुम्हारा स्वागत है तुम मुझे बहुत प्रिय हो तुम्हारे आने से ही तो जीवन दायनी वर्षा होती है , हरियाली छा जाती है , तीज त्यौहार आते हैं | लडकियां गीत गाती है झूले झूलती हैं | तुम्हारे आने पर रक्षाबंधन पर्व आता है बहनें अपने भाई को राखी बांधती है | सावन अपनी प्रशंशा सुनकर बहुत खुश हुआ | बुढ़िया ने जाते हुए उसे एक लड्डू दिया ,जाते हुए वह झोंपड़ी के एक कोने को पैर लगाकर गया जिससे बुढ़िया की झौंपड़ी का एक कोना सोने का हो गया |
इसी तरह फिर एक दिन भादों के महीने ने आकर बुढ़िया की किवाड़ी खटखटाई | भादों का परिचय पाकर बुढ़िया ने कहा तुम तो मुझे बहुत प्रिय हो तुम आते हो तो कजली तीज ,जन्माष्टमी ,गोगा , नागपंचमी ,जल झूंडनि एकादशी और गणेश चतुर्थी भी आती है खूब चहल पहल रहती है | बुढ़िया ने भादों को भी एक लड्डू दिया वह भी बड़ा खुश हुआ और जाते हुए झोपडी को पैर लगाकर चला गया जिससे झोपडी का दूसरा कोना भी सोने का हो गया |
इसी तरह आसोज का महीना आया तो बुढ़िया ने उसका भी स्वागत किया और कहा तुम मुझे बहुत अच्छे लगते हो तुम्हारे आने से पितरों को संतुष्ट करने वाला पितृपक्ष आता है ,नवरात्र ,दुर्गाअष्टमी ,विजयदशमी और शरदपूर्णिमा आदि पर्व आते हैं | जाते हुए बुढ़िया ने उसे लड्डू दिया और वह भी प्रसन्न होकर झोपडी के एक कोने को पैर लगाकर चला गया जिससे झोपडी का तीसरा कोना भी सोने का हो गया |
अब कार्तिक आया | बुढ़िया ने उसकी भी खूब प्रशंशा की और उसका स्वागत करते हुए बोली तुम्हारे तो सभी दिन पर्व के सामान हैं ,कार्तिक की धूल ही सोना होती है | किसानो की फसलें कटती हैं , भगवान् का भोग लगता है , गोबर्धन पूजा होती है ,गोपाष्टमी आती है , गायों की पूजा होती है , जिनकी सब कामना करते है उन महालक्ष्मी देवी की पूजा होती है | दीपावली से पहले सब अपने घरों की सफाई करते हैं , घरों में तरह तरह के पकवान बनते हैं , दीपावली की रात दीपकों के प्रकाश से जगमगा उठती है | चार महीनो की लम्बी निद्रा त्याग सभी देवता उठ खड़े होते है और सभी रुके हुए कार्य शुरू हो जाते हैं | जाते हुए कार्तिक को भी बुढ़िया ने एक लड्डू दिया और जाते हुए कार्तिक बुढ़िया की सारी झोपडी ही सोने की कर गया |
कार्तिक का महीना बीतते ही बुढ़िया का बेटा उसे लेने आया लेकिन उसे उसकी झोपडी नहीं मिली तो उसने आस पास की औरतों से पूछा तो उन्होंने बताया वह सोने की झोपडी ही तुम्हारी माँ की झोपडी है उसे यह सुनकर बड़ी ख़ुशी हुई उसने अपनी माँ को गोद में उठाकर गाडी में बैठाया और साथ में सोने की झोपडी भी रखकर अपने घर आ गया | सोने की झोपडी देखकर उसकी बहु को बड़ी डाह हुई उसने अपने पति से कहा अपनी माँ को तो गंगाजी ले गए ,भला मेरी माँ को क्यों ले जाते | उसका पति बोला ठीक है अबका सावन आएगा तो तेरी माँ को भी ले जाऊँगा |
बहू ने बड़ी ब्याकुलता के साथ सेष साल बिताया और जब सावन का महीना आया तो उसने अपनी माँ के लिए खुब्ब मेबे और घी डालकर लड्डू बनाये | दामाद अपनी सास को लेकर गंगाजी की और चल पड़ा | वहां पहुंचकर उसने अपनी सास के लिए भी एक झोंपड़ी बनाई और पड़ोसियों को उसकी सार सम्हाल देकर स्वयं घर आ गया |
बड़े तड़के ही पड़ोसियों ने उसे जगाकर कहा आओ गंगा स्नान को चलें तो वह बड़बड़ाती हुई बोली “तुम सब बड़ी मुर्ख हो इतने तड़के वहाँ क्या रखा है , मैं तो अभी नहीं जाउंगी तुम सब यहाँ से निकलो “| वे सब बहां से चली गईं तो बुढ़िया फिर सो गई , उठी तो सारा दिन पड़ोसियों को कोसने में लगा दिया | रात को जब वह लड्डू खाने बैठी तो किसी ने उसकी किवाड़ी खटखटाई ,बुढ़िया ने पूछा इस बक्त रात को भी कौन आ मरा ? उत्तर मिला मैं सावन हूँ बुढ़िया ने खीजकर कहा तुम तो बहुत बुरे हो तुम्हारे आते ही सारी बिबाहित छोरियाँ अपने पीहर आ जाती है और महीने भर पौं पौं करती रहती है कभी ये चाहिए कभी वो चाहिए इसलिए तुम मुझे बहुत बुरे लगते हो | बुढ़िया की बात सुनकर सावन को गुस्सा आ गया और उसने उसकी झोपडी को एक लात लगा दी जिससे उसकी झोपडी का एक कोना टूट गया |
अगले महीने भादों आया तो बुढ़िया ने उसको भी भला बुरा कहा , भादों ने भी उसकी झोपडी को एक लात मारी जिससे झोपडी का दूसरा कोना भी टूट गया | इसी तरह आसोज ने भी उसकी झोपडी को लात मारकर उसका तीसरा कोना भी तोड़ दिया | और अंत में कार्तिक ने उसकी समूची झोपडी ही नष्ट कर दी और बुढ़िया सुकरी बनकर अन्य सुक्रियों के साथ फिरने लगी |
कार्तिक का महीना बीतने पर दमाद अपनी सास को लेने आ पंहुचा , लेकिन उसे उसकी झोपडी कहीं दिखाई नहीं दी ,उसने आस पड़ोस की स्त्रियों से पूछा तो उन्होंने बताया तुम्हारी सास सुकरी बन घूम रही है जिस सुकरी की नाक में नथ है वही तुम्हारी सास है | दामाद अपनी सुकरी सास को गाडी में डाल घर ले आया | घर पर बेटी बड़ी उत्सुकता से अपनी माँ का इन्तजार कर रही थी कि उसकी माँ सोने की झोपडी के साथ आ रही होगी लेकिन जब उसने अपनी माँ को सुकरी के रूप में आया देखा तो उसे बड़ी निराशा हुई | पंडितों से पूछने
पर उन्होंने कहा तुम्हारी माँ सुकरी से इंसान तभी बन सकती है जब तुम अपनी सास की धोती स्वयं धोकर उस जल से अपनी माँ को निहलाओ | लाचार बहु ने ऐसा ही किया तब जाकर उसकी माँ स्त्री बनी |

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