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कहानी चार सार की

Byuser

Mar 22, 2021

दोस्तों ये कहानी एक लोक कहानी है जो शायद आपने ,अपने घर के किसी बुजुर्ग से सुनी भी हो हालाँकि इस तरह की कहानीयां जहां पहले मनोरंजन का साधन हुआ करती थी वंही सुनने बाले के लिए ये शिक्षाप्रद भी होती थीं |

इसी तरह की एक कहानी जो मैंने अपने बुजुर्गों से सुनी है वैसे ही आपके लिए लिख रहा हूँ | मुझे यकीं है की आप पढ़ेंगे तो आपको भी अच्छी लगेगी |

कहानी कुछ इस प्रकार है एक राजा था वीरसिंह जिसका राज्य उत्तर भारत में फैला हुआ था | राजा वैसे तो ठीक था लेकिन वह सिर्फ अपने मंत्रियों के सुझाये गए रास्तों पर ही प्रजा के लिए कानून बनाकर लागु करवा देता था वह स्वयं उन कानूनों का प्रजा पर क्या असर हो रहा है इस बात की निगरानी नहीं करता था|  जिससे प्रजा  के अंदर ही कुछ ऐसे लोग भी थे जो इस बात से दुखी थे |

उसी राज्य में एक महात्मा थे जिनका नाम था ब्रह्मऋषी जब ब्रह्मऋषी को कुछ लोगों ने अपनी परेशानी का कारन बताया तो ब्रह्मऋषी बाबा ने राजा को समझाने का सोचकर दरवार में जाने का निश्चय किया |

उस समय राजा और प्रजा दोनों ही महात्माओं का बड़ा आदर सत्कार करती थी | महात्माओं को राज दरबार में आने जाने की कोई रोकटोक नहीं थी इसलिए ब्रह्मऋषी बाबा एक समय निर्धारित करके राजदरवार में पहुँच जाते हैं राजा उनके सम्मान में खड़े हो जाते हैं और दरवार में आने का प्रयोजन पूछते हैं तब ब्रह्मऋषी बाबा कहते है कि राजन वैसे तो आपके शासन में सब कुछ है लेकिन आपके दरवार में चार सार  की कमी है अगर वो भी होते तो सब पूर्ण हो जाता | हालाँकि राजा सार  का मतलब नहीं समझ सका था फिर भी राजा ने कहा महात्मन मैं शीघ्र ही उन्हें राज्य में मगवाने का प्रयत्न करता हूँ | ये सब कहकर ब्रह्मऋषी महाराज चले जाते हैं |

अब राजा सब मंत्रियों से कहता है की बताओ कि ये सार क्या होता है और कहाँ मिलेगा | लेकिन इसका उत्तर किसी के पास भी नहीं था | जब राजा को किसी से भी उत्तर नहीं मिला तो राजा ने कहा अपने गुप्तचर चारों दिशा में भेजे जाएँ जो सबसे पहले ये चार सार लाकर देगा उसको भारी ईनाम दिया जायेगा |एक महीने के अंदर अगर सार लेकर नहीं दिए तो सबका सर कलम कर दिया जायेगा |

राजा के चतुर से चतुर गुप्तचरों को चारों दिशा में भेज दिया गया | सभी गुप्तचर बड़े बड़े सेठों के पास जाते और चार सार  की मांग करते लेकिन कोई भी सेठ ऐसे किसी सार के वारे में नहीं जानता था इसी तरह कई दिन गुजर गए लेकिन सार नहीं मिल रहे थे| उनमें से एक बुजुर्ग गुप्तचर ने सोचा की कंही ये किसी गांव में तो नहीं मिलेगा और वह इनकी तलाश में गांव -गांव भटकने लगा लेकिन कोई भी सार  के वारे में नहीं जानता था | ऐसे ही एक दिन थककर वह एक पेड़ के नीचे बैठकर स्वयं ही कहता है की पता नहीं ये सार कहाँ मिलेंगे अगर नहीं मिले तो राजा गर्दन उड़वा देगा उसकी बात पास में ही बैठे एक बुजुर्ग सुन लेते हैं और कहते हैं की भाई में तुम्हें ये चार सार दे सकता हूँ | उसकी बात सुनकर गुप्तचर के चेहरे पर चमक आ जाती है | वह कहता की भाई जल्दी से मुझे वो सार दे दो में इसके बदले तुम्हें बहुत सारी सोने की मुद्राएं दे दूंगा |

वह व्यक्ति गुप्तचर को एक कागज में कुछ लिखकर बंद करके दे देता है और कहता की भाई ये राजा को दे देना | गुप्तचर उसे ढेर सारा इनाम देकर बापिस निर्धारित समय से पहले पहुँच जाता है और जाकर वह पुड़िया राजा को दे देता है | राजा वो पुड़िया अपने पास रख लेता है | सोचता है जरूर यह कोई कीमती चीज होगी तभी ब्रह्मऋषी महाराज ने इस कमी को पूरा करने का आदेश दिया है | राजा उन्हें लेकर अपने शयन कक्ष में जाता है और सोचता है की इसे रात को खोलकर देखेगा |

जैसे ही रात गहराई राजा ने वह पुड़िया खोली तो उसमें चार पुड़िया मिली राजा ने पहली पुड़िया खोली तो उसमें लिखा था

रात्रिजागरण सार ,राजा पढ़कर समझ गया कि ब्रह्मऋषी महाराज का आदेश है कि मैं रात को जागकर प्रजा के हालचाल जानूं | राजा अपना भेष बदलकर रात को घूमने निकल जाता है | अभी घूमते हुए उसको कुछ ही समय हुआ था की एक घर से रोने की आबाज सुनाई दी | पास जाकर देखता है की एक बुढ़िया रो रही है | राजा पूछता है की माई क्यूँ रो रही हो तुम्हें क्या कष्ट है | पहले तो बुढ़िया कुछ बताती नहीं लेकिन राजा के बार बार आग्रह करने पर वह बताती है कि इस देश का जो राजा है वह कल मर जायेगा | राजा ने कियूँकि भेष बदल रखा था इसलिए वह उसे पहचान नहीं पाई थी | एक बार को राजा उसकी बात सुनकर परेशान हो जाता है कि कल वह मर जायेगा | फिर थोड़ा सभंल कर वह कहता है कि माई यदि राजा मर जायेगा तो तुम क्यों रो रही हो | बुढ़िया कहती है की राजा के कुछ मंत्री बड़े दुष्ट हैं यदि राजा मर गया तो वह प्रजा पर और अत्याचार करेंगे | राजा फिर कहता है की माई ये तो बताओ की राजा किस तरह मरेगा और तुम्हें ये सब कैसे पता है | बुढिया कहती है कि में पक्षियों की भाषा समझ लेती हूँ पक्षियों को मैंने ऐसा कहते सुना था कल एक सर्प आएगा और राजा को डस  लेगा  | तो तुमने ये बात राजा को क्यों जाकर नहीं बताई तो बुढिया कहती है की यदि में यह सब राजा को बता देती हूँ और राजा यही बात किसी और को बता देता है तो वह उसी समय पत्थर का हो जायेगा अब मैं राजा  को ये तो नहीं कह सकती कि वह ये बात किसी को न बताये इसी लाचारी के रहते ही तो मैं रो रही हूँ | राजा सारी बात जानकर अपने महल लौट आता है|  (इससे आगे की कहानी अगले भाग में )

 

 

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