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कौड़ीधज घोड़े का दाव

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Aug 9, 2021

पाटन के राजा सिद्धराज सोलंकी के राज्य में कालिया और खापरिया नाम के दो नामी चोर थे | दोनों आपस में जिगरी यार भी थे | दिवाली के दिन दोनों जुआ खेलने बैठ गए और जुए में दाव पर राजा का सबसे प्रिय घोडा कोड़ीधज दाव पर लगा दिया और कहा हारने वाले को राजा से किसी भी तरह घोडा लाकर देना होगा | इस जुए में खापरिया हार गया तो उसने कालिया से 12 महीने का समय माँगा और घोडा लाने रवाना हो गया |
खापरिया पाटन पहुँच कर अस्तवल में नौकर हो गया और तन मन से काम करने लगा | धीरे धीरे वह राजा का बिस्वास पात्र बन गया | घोड़ों की सेवा में कुशल जान कर राजा ने उसे अपने घोड़े कोड़ीधज की सेवा का भार सौंप दिया | खापरिया खूब मन लगाकर काम करने लगा राजा भी उसके काम से संतुष्ट हो गया |
एक दिन राजा को सपने में एक स्त्री हाथों हाथी दांत का चूड़ा पहने और लाल ओढ़ना ओढ़े दिखलाई पड़ी | उसने सोये हुए राजा को आदेश दिया कि राजा उठ मैं पृथ्वी हूँ मुझे आभूषण पहना इतना कहकर वह स्त्री अदृश्य हो गई | राजा ने सोचा यूं ही सपना आया होगा लेकिन दूसरे दिन फिर वही सपना राजा को आया तो उसने पंडितों को बुलाकर सपने का मतलब जानना चाहा | पंडितों ने बिचार कर बताया महाराज पृथ्वी का गहना देवालय है अत : आप एक भव्य मंदिर का निर्माण कराएं यही धरती माता की कामना है |

राजा ने देश विदेश के कारीगर बुलाये लेकिन कोई भी कारीगर ऐसा नक्शा नहीं बना पाया जो राजा को पसंद आये | राजा के मन में यही बिचार रहता कि मंदिर किस तरह बनेगा | खापरिया चोर तक भी यह बात पंहुची उधर दीपावली भी आ गई तो खाप्रिया ने सोचा कि अपनी अबधि भी पूरी होगी है तो वह उसी रात राजा सिद्धराज के घोड़े कोड़ीधज पर सवार हो अस्तवल से निकल गया उसने घोड़े को ऐड लगाई और घोडा शहर पनाह को लांघकर तीर की तरह उड़ चला | राजा के सवारों ने खापरिया का पीछा करना चाहा लेकिन राजा ने यह कहकर मना कर दिया कि तुम कौड़ीधज तक नहीं पहुँच सकोगे |

खापरिया तोड़ी देर में ही अपने स्थान के निकट पहुँच गया उसने सोचा अब राजा के सेवक मुझे नहीं पकड़ सकेंगे अत : वह वहीँ उतर गया और सुस्ताने लगा घोड़े को उसने एक पेड़ से बाँध दिया थोड़ी ही देर में उसने देखा कि उसके समीप ही धरती से एक बहुत ही सुन्दर मंदिर निकला है खापरिया उस मंदिर की शोभा देखता ही रह गया | थोड़ी देर में ही वहां देवता आकर अपने आसनों पर बैठ गए सबसे अंत में राजा इंद्र आये और वहां राग रंग और नाच गाना होने लगा खापरिया भी मंदिर के एक कोने में जाकर छुप कर बैठ गया और मस्त होकर सारा दृश्य देखने लगा | दो घडी रात सेष रहने पर सभी देवता उठ उठकर जाने लगे | लेकिन आज मंदिर बापिस धरती में नहीं समां रहा था ,देवताओं ने सोचा आज जरूर मृत्यु लोक का प्राणी मंदिर में आ गया है | खोजने पर खापरिया मिल गया तो देवताओं ने उससे पूछा कि तू कौन है और यहाँ कैसे आया | खापरिया ने सब कुछ सच सच बता दिया और देवताओं से पूछा कि ये मंदिर अब फिर कभी धरती से प्रकट नहीं होगा | देवताओं ने कहा दीपावली पर यह मंदिर तीन दिन निकलता है और यही कार्यक्रम चलता है | कल और परसों यही क्रम फिर से चलेगा यह सुनकर खापरिया मंदिर से बाहर आ गया उसके बाहर आते ही मंदिर धरती में समां गया |

खापरिया ने सोचा जैसा मंदिर राजा बनाना चाहता है यह बैसा ही मंदिर है यदि मैं राजा को यंहा लाकर यह मंदिर दिखला दूँ तो उसका क्लेश मिट जाएगा तथा मनोरथ सिद्ध हो जायेगा | यह सोचकर खापरिया घोड़े पर सवार होकर राजा सिद्धराज सोलंकीके सामने हाजिर हो गया | राजा ने उसे देखते ही क्रोध में भरकर पूछा कि तू घोड़े को लेकर कहाँ गया था | खापरिया ने आदि से लेकर अंत की सारी कहानी राजा को सच सच बता दी और राजा से मंदिर देखने की प्रार्थना की | राजा और खापरिया दोनों चल पडे और उसी स्थान पर आकर ठहरे | राजा सो गया और खापरिया पहरा देता रहा | आधी रात को धरती फटी और मंदिर बाहर निकला | खापरिया ने राजा को जगाया , राजा ने मंदिर देखा तो देखता ही रह गया |

दोनों छिपकर मंदिर में गए और अप्सराओं का नृत्य देखने लगे | दोनों ही सुध बुध भूल बैठे | दो घड़ी रात सेष रही तो उत्सव ख़त्म हुआ और देवता उठ उठकर जाने लगे लेकिन मंदिर पृथ्वी में नहीं समाया खोज करने पर देवताओं ने उन्हें ढूंढ लिया राजा वहां से हटने को तैयार नहीं हुआ तो स्वयं इंद्र ने कहा तुम लोग यहाँ से बाहर जाओ सवेरा होने वाला है और मंदिर धरती में समायेगा | राजा ने इंद्र से प्रार्थना करते हुए कहा देवराज मैं ऐसा ही मंदिर पृथ्वी पर बनाना चाहता हूँ सो कृपा करके मुझे एक शिल्पी दीजिये जो मेरा मनोरथ पूरा कर सके | इन्दर ने राजा को सात गोलियां दीं और कहा जो शिल्पी इन गोलियों को एक ऊपर एक चढ़ा देगा वही इस तरह का मंदिर बना पायेगा | राजा और खापरया गोली लेकर मंदिर से बाहर आ गए उनके बाहर आते ही मंदिर धरती में समां गया |

राजा ने अपने महल पहुंचकर सबसे पहले खापरिया को कौड़ीधज घोडा और सिरोपाव देकर बीदा किया और खा आज दिवाली है और तू अपने मित्र से किया वादा पूरा कर और अपने वचन के अनुसार यह घोडा उसे जाकर दे दे | खापरिया खुशी-खुशी वहां से घर की और चल पड़ा|

इधर राजा ने देश विदेश के शिल्पी बुलवाए ,लेकिन किसी से भी वह गोलियां एक के ऊपर एक नहीं चढ़ाई गईं | राजा की निराशा बढ़ती जा रही थी | एक गांव में एक कुशल शिल्पी रहता था वह अपने बेटे को लेकर राजा के पास जाने लगा तो शिल्पी ने कहा बेटा बाट -बाट तो बेटा टाँकी और हथोड़ा उठा लाया तो शिल्पी बोला बीटा तू तो शादी सुदा होकर भी कुआँरा रह गया तुझसे गोली नहीं चढ़ाई जाएंगी | शिल्पी ने अपने बेटे का दूसरा विबाह कर दिया फिर तीसरा कर दिया जब भी वह गोलियां चढाने को चलते तो बाप बेटे में बही संवाद होता | अब शिल्पी ने अपने बेटे का चौथा बिबाह कर दिया आते ही उसकी चौथी पत्नी ने पूछा ससुर जी तुम्हारे बिबाह पर बिबाह क्यों किये जा रहे हैं | उसके पति ने सारी बात अपनी पत्नी को बताई | बहु ने अपने पति को सात छल्ले दिए और कहा ससुर जी जब तुमसे वही बार्तालाप करें तो उन्हें यह छल्ले दे देना और कहना एक गोली के ऊपर एक छल्ला रखते जाना गोलियां नहीं गिरेंगी | शिल्पी ने जाकर वैसे ही किया , और प्रसन्न होकर बोला कि अब तू ब्याहा गया है | इस तरह से हम मंदिर बनाएंगे |

शिल्पी राजा के पास पंहुचा | उसने छल्लों की मदद से सातों गोलियां एक के ऊपर एक रख दीं | राजा प्रसन्न हुआ और मंदिर बनाने का सारा काम उस शिल्पी को सौंप दिया | शिल्पी ने बहुत सुन्दर मंदिर बनाया ,जिससे राजा भी प्रसन्न हुआ और धरती भी संतुष्ट हो गई |


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