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यादों में होली

Byuser

Mar 29, 2021

गैट रियलखबर की तरफ से सभी को होली की शुभकामनाएं |

जी हाँ होली के उन दिनों को यादों में ही ताजा किया जा सकता है | आज से तकरीबन 20 वर्ष पीछे जाकर एक बार उन यादों को ताजा करने की कोशिश कीजिये |आज की होली और उन दिनों की होली में कुछ अंतर महसूस तो होता ही होगा|

आज शहर में सिर्फ घर में कुछ अच्छा पकाया या ज्यादातर ड्रिंक पार्टी करके होली मनाई जाने लगी है या फिर कुछ हुड़दंगी बच्चों द्वारा महिलाओं/लड़कियों को गलत तरीके से स्पर्श करने के उद्देश्य से होली  मनाई जा रही है |

इससे अलग उस समय की होली का उल्लास लगभग 15 दिन पहले शुरू हो जाता था | पहले होली एक दूसरे पर पानी डालकर शुरू होती थी | जिस दिन होली को जलाने का प्रोग्राम होता था यानि रंग से एक दिन पहले उसकी तैयारी तो महिलायें कई दिन पहले से गोबर की बिरकुली बनाकर शुरू करती थी | मुझे याद है मेरे गाँव में दो बड़ी होली रखी जाती थीं | गाँव काफी बड़ा था इसलिए दो होली रखे  जाना स्वभाविक भी था |

हर घर के आँगन में एक छोटी होली जो सिर्फ बिरकुली की मालाओं से बनी होती थी ,रखी जाती थी | उस दिन  घर के आदमी या बच्चों का काम होता था खेतों से जाकर जौ/गेहूं छोटी छोटी गुच्छी तैयार करके लाना |

गाँव के पण्डितजी एक निश्चित समय पर शाम को बड़ी होली की पूजा करते थे |पूजा के समय गाँव की महिलायें/बच्चे नए -नए कपड़े पहनकर बड़ी होली की पूजा में संमलित होते थे सभी के हाथों में अपने अपने घर से ली गई एक एक बिरकुली की माला  होती थी | गाँव की होली तो पहले ही विशाल होती थी जबकि सभी के द्वारा एक एक माला डाले  जाने से और भी विशाल हो जाती थी |

पण्डितजी से सुबह ही पता चल जाता था की शाम को किस समय होली जलाई जाएगी उस समय तो मानो सारा  गाँव ही वहाँ एकत्र हो जाता था | होली की परिक्रमा और उसके बाद उसमें आग लगाई जाती  तो उसकी लपटें लगता आसमान छू रही हों |इस बड़ी होली में से सभी, थोड़ी सी अग्नि लेकर अपने घर जाते और घर की होली को प्रज्वलित कर उसी में जौ भुने जाते |

फिर सिलसिला शुरू होता घर घर भुने हुए जौ बांटने का बच्चे एक टोली बनाकर हर घर में जौ देते बड़ों के पैर छूते और उनसे आशीर्वाद लेते इस तरह रात के एक /दो बजे यक यह सिलसिला चलता रहता |

देर रात तक चलने वाले इस प्रोग्राम से सुबह के उमंग या उल्लास में कोई कमी नहीं आती थी सभी फिर जल्दी जाग जाते और रंग खेलने का प्रोग्राम बनाना शुरू कर देते |उस समय आज की तरह रेडीमेड पिचकारियाँ नहीं थी लेकिन बांस की बनाई गई पिचकारी सभी के पास होती थी |

रंग गुलाल से शुरू की गई होली शाम होते -होते  गली की नालियों की कीचड़ तक पहुँच जाती | सबसे अनोखी और मस्त बात ये थी कि यदि कोई किसी के ऊपर कीचड़ फेंक भी देता तब भी कोई बुरा नहीं मानता था |

शाम को जैसे ही होली धीमी पड़ती तभी गाँव की एक टोली ढोलक और मजीरों के साथ चौपाई /होली गाकर पूरे गाँव की फेरी  लगाती ,इसका आनंद लिखकर बयान नहीं किया जा सकता ये तो जिसने देखा या सुना है ,वही महसूस कर सकता है |

मैं  उन आनन्द  के पलों को याद कर रोमांचित हो रहा हूँ | आपने भी वैसी होली खेली है तो यादों में ही सही ,याद करके खुद रोमांचित हों और अपने बच्चों को भी बताएं |

 

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