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म्यांमार या बर्मा? आखिर क्यों हैं इस देश के दो नाम, जानिए सबकुछ

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Feb 5, 2021

म्यांमार में रविवार यानी 31 जनवरी की आधी रात तख्तापलट हो गया। स्टेट काउंसलर आंग सान सू की और राष्ट्रपति विन मिंट समेत कई नेता गिरफ्तार कर लिए गए और सेना ने शासन अपने हाथों में ले लिया। मिलिट्री का कहना है कि तख्तापलट जरूरी हो गया था, क्योंकि सरकार नवंबर के चुनावों में वोटर फ्रॉड के अपने अपुष्ट दावों पर कोई कार्रवाई नहीं कर रही थी। पर वास्तव में तख्तापलट हुआ कहां? म्यांमार में, क्योंकि देश का औपचारिक नाम यही है? या बर्मा में, जिसे अमेरिका इस नाम से पुकारता है? इसका जवाब बेहद जटिल है। जब बात म्यांमार की आती है तो हर बात राजनीतिक हो जाती है। यहां तक कि भाषा भी। पीढ़ियों से प्रमुख बर्मन जातीय समूह की वजह से इस देश को बर्मा कहा जाता रहा है। पर सत्तारूढ़ जुंटा द्वारा लोकतंत्र समर्थक विद्रोह को बेरहमी से कुचलने के एक साल बाद 1989 में सैन्य नेताओं ने देश का नाम अचानक बदलकर म्यांमार कर लिया। तब तक, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे बर्मा नाम से ही पहचाना जाता था। सैन्य नेताओं को लगा कि देश की छवि बदलने की जरूरत है, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता हासिल करने की उम्मीद में नाम बदल ‍‍दिया। तब सैन्य शासन ने कहा था कि देश गुलामी के दिनों को भूलना चाहता है। जातीय एकता को बढ़ावा देना चाहता है। पुराना नाम एक जातीय समूह का था, जिससे कई दूसरे जातीय अल्पसंख्यक समुदाय खुद को जोड़ नहीं पा रहे थे। पर घर में कुछ नहीं बदला। बर्मी भाषा में “म्यांमार” केवल “बर्मा” का अधिक औपचारिक संस्करण है। देश का नाम केवल अंग्रेजी में बदला। यह भाषाई करतब था, जिससे लोगों को बेवकूफ बनाया गया था। दुनिया के अधिकांश देशों ने नए नाम का उपयोग करने से इनकार किया और जुंटा का विरोध किया। एक दशक से कुछ समय पहले देश ने अर्ध-लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपनाया। सैन्य शासन ने राजनीतिक अधिकार अपने पास रखे। विपक्षी नेताओं को जेल और घर पर नजरबंदी से मुक्त किया। चुनाव लड़ने की अनुमति भी दी। तब लोकतंत्र समर्थक कार्यकर्ता आंग सान सू की देश की नागरिक नेता बन गईं। इन वर्षों में दुनियाभर के समाचार पत्र समूहों और मीडिया संगठनों ने देश के नए नाम का इस्तेमाल शुरू कर दिया था। जैसे ही दमन कम हुआ और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विरोध कम हुआ तो “म्यांमार” शब्द तेजी से प्रचलन में आया। देश के अंदर भी विपक्षी नेताओं ने स्पष्ट कर दिया था कि उन्हें नए नाम से कोई दिक्कत नहीं है।दुनिया के अधिकांश देशों से परे अमेरिकी सरकार आज भी औपचारिक तौर पर देश का नाम “बर्मा” ही लिखती है। वॉशिंगटन के रुख में नरमी जरूर आई थी। 2012 में देश की यात्रा पर तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा ने “बर्मा” और “म्यांमार” दोनों नामों का इस्तेमाल किया। तब इसे पॉजिटिव माना गया। कहा कि यह “म्यांमार की सरकार की स्वीकृति” है। तख्तापलट पर वॉशिंगटन की प्रतिक्रिया ने पुरानी आलोचनाओं को सामने ला दिया, जिसमें प्रेसिडेंट जो बाइडेन और विदेश मंत्री एंटोनी ब्लिंकन ने स्पष्ट रूप से देश के कानूनी नाम से परहेज किया और म्यांमार के बजाय बर्मा का ही जिक्र किया। बाइडेन ने बयान में कहा, “संयुक्त राज्य अमेरिका ने लोकतंत्र की दिशा में प्रगति के आधार पर पिछले एक दशक में बर्मा पर प्रतिबंध हटा दिए थे। अब तख्तापलट हो गया है और फिर सैन्य शासन आ गया है तो उन प्रतिबंधों का तत्काल रिव्यू करना जरूरी होगा।” हालांकि, अधिकांश देश अब भी इसे म्यांमार ही कह रहे हैं।आंग सान सू की समेत अन्य बड़े नेताओं की गिरफ्तारी के बाद पूरे देश में विरोध शुरू हो गया है। देश में कई लोकतंत्र समर्थकों ने अलग-अलग तरीके से तख्तापलट का विरोध जताया। सोमवार रात को मिलिट्री ने नाइट कर्फ्यू लगाया तो लोग यांगून में छत पर पहुंचे और उन्होंने अलग-अलग म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट बजाकर एकजुटता दिखाई। सोशल मीडिया पर भी तख्तापलट के खिलाफ सैकड़ों पोस्ट किए गए।

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